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मनमोहन आईएसआई पर ओबामा का प्रहार चाहते हैं
Oct 12,2009 00:00
काबुल में भारतीय दूतावास पर हाल में हुए दूसरे आतंकी हमले में भी आईएसआई की संलिप्तता पर अमेरिकी मुहर लेने की कोशिशें तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से फोन पर हुई बातचीत के दौरान इसी कोशिश को परवान चढ़ाया गया। प्रधानमंत्री ने ओबामा को यह बताने में हिचक नहीं दिखाई कि मुंबई और जम्मू-कश्मीर की तरह दूतावास पर हमले में भी 'पाकिस्तानी तंत्र' की भूमिका है। उच्चपदस्थ सूत्रों के अनुसार 'पाकिस्तानी तंत्र' से प्रधानमंत्री का स्पष्ट आशय और इशारा आईएसआई की ओर था। मनमोहन सिंह और ओबामा की फोन पर यह बातचीत शनिवार को हुई। ह्वाइट हाउस ने भी भी इस बातचीत के दौरान ओबामा की ओर से काबुल हमलों को लेकर जताई गई चिंता का उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने अफगानिस्तान सरकार और हमले के बाद जायजा लेने गई भारतीय विदेश सचिव निरुपमा राव की रिपोर्ट के आधार पर ओबामा को यह संकेत दिया गया कि दूतावास पर हमला पाक की खुफिया एजेंसी की ही करतूत है। समझा जाता है कि प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष जुलाई में काबुल दूतावास पर हुए हमले का भी जिक्र किया। इस हमले को खुद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आईएसआई की करतूत बताया था। इस बार भी अफगानिस्तान सरकार ने तो सीधे-सीधे आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया है, लेकिन भारतीय राजनयिकों और सरकार को लग रहा है कि अमेरिकी मुहर के बगैर इस मामले में पाक को घेरने में कामयाबी नहीं मिल सकती। समझा जाता है कि प्रधानमंत्री से इस संक्षिप्त वार्तालाप के दौरान ओबामा ने साफ कर दिया कि भारत-अफगानिस्तानके आपसी रिश्तों को'निर्देशित' नहीं किया जा सकता। इसे पाकिस्तान को ओबामा की नसीहत के तौर पर देखा जा रहा है। यह इस बात का पुख्ता सुबूत है कि अमेरिकी प्रशासन मान रहा है कि अफगानिस्तान में भारत की मजबूत होती पैठ से पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के होश गुम हो रहे हैं। भारत की प्रभावशाली उपस्थिति पाकिस्तान को दोहरी चुनौती दिख रही है। एक ओर अफगानिस्तान से लगी पश्चिमी सीमा से भारत के 'झांकने' का खतरा दिख रहा है तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद निर्यात करने की उसकी चाल की गति धीमी पड़ने का। हालांकि यह भी सच है कि भारतीय कूटनीतिज्ञ अफगानिस्तान में अमेरिकी व बहुराष्ट्रीय सैनिकों की तालिबान आतंकियों से जारी लड़ाई के मुकाम पर पहुंचने तक पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी प्रशासन की भूमिका की एक सीमा से ज्यादा अपेक्षा नहीं कर रहे। ओबामा-मनमोहन की यह फोन वार्ता नोबेल शांति पुरस्कार की बधाई देने के सिलसिले में हुई थी। मनमोहन ने शुक्रवार को ओबामा को फोन किया तो वह बाहर थे। लौटने पर शनिवार को उन्होंने प्रधानमंत्री को जवाबी फोन किया। |