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राजभवन व यूपी सरकार में ठनी

on जून 09,2009

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सूचना का अधिकार कानून के मामले में राज्यपाल टीवी राजेस्वर के संज्ञान में लाए बिना उनके नाम पर जारी एक अधिसूचना से राज्य सरकार और राजभवन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। राजभवन का कहना है कि वह इस मामले पर विधिक राय लेकर कार्रवाई करेगा जबकि सरकार का कहना है ऐसी किसी अधिसूचना को जारी करने से पहले राज्यपाल की अनुमति जरूरी नहीं है। सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 24 की उपधारा 4 के अंतर्गत ऐसी अधिसूचना जारी की जा सकती है। दूसरी ओर कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक पार्टियों ने इसे गंभीर संवैधानिक उल्लंघन का मामला बताते हुए व्यापक आंदोलन की चेतावनी दी है।

कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के नेतृत्व में शिष्टमंडल ने सोमवार को राज्यपाल को इस मामले से अवगत कराया तो उन्होंने ऐसी किसी सूचना के जारी करने की अनुमति देने से अनभिज्ञता प्रकट की। बाद में राजभवन सूत्रों ने जागरण से भी इसकी पुष्टि की। रीता जोशी के अनुसार राज्यपाल ने उन्हें आश्वासन दिया कि विधिक राय लेकर इस पर जरूर कार्रवाई करेंगे।

ज्ञातव्य हो कि दो जून को प्रशासनिक सुधार विभाग के प्रमुख सचिव की जारी अधिसूचना [सं. 966/43-2-2009] में 'सूचना का अधिकार कानून' के दायरे से 14 विषयों को बाहर कर दिया गया। अधिसूचना में लिख गया है कि 'राज्यपाल निर्देश देते हैं कि अमुक विषयों को सूचना के अधिकार अधिनियम की परिधि से अपवर्जित रखा जाएगा।' इसमें राज्यपाल, महाधिवक्ता, हाईकोर्ट के न्यायाधीशों व मंत्रियों की नियुक्ति, मंत्रियों की आचरण संहिता, राज्यपाल व राष्ट्रपति के बीच पत्राचार एवं मंत्रियों व सांसदों के खिलाफ जांच के मामले आदि शामिल हैं। राजाज्ञा पर बवाल होने के बाद राज्य सरकार ने कल ही इसमें संशोधन करते हुए नौ मामलों को इससे निकाल दिया किन्तु पांच अब भी सूचना का अधिकार कानून के दायरे से बाहर है।

राज्यपाल को ज्ञापन देने के बाद रीता जोशी ने पत्रकारों को बताया सरकार हर वह काम कर रही है जो संविधान विरोधी है। पहले उसने पीजीआई जैसी नामी गिरामी संस्था के महत्व को कम करने के लिए जीओ जारी किया। कांग्रेस ने दबाव बनाया तो उसे वापस लिया गया अब सूचना का अधिकार जैसे केन्द्रीय कानून के साथ छेड़ छाड़ किया गया जिसका उसे कोई अधिकार ही नहीं है। इससे पहले लखनऊ के मास्टर प्लान को बदल दिया गया। यह सारी मनमानी सरकार अपने भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए कर रही है।

उन्होंने कहा सूचना का अधिकार कानून संसद द्वारा बनाया गया है उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। जिस धारा 24 की आड़ में सरकार ने राजाज्ञा जारी की उसमें सिर्फ 'सुरक्षा' व 'अभिसूचना' संबंधी मामले ही आते हैं। इसमें भी संशोधन के लिए विधानमंडल द्वारा प्रस्ताव पास होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरकार ने खुद अपना मजाक बनाया है। मंत्रियों के लिए कोई आचरण संहिता नहीं है। वह परम्पराओं के अनुरूप काम करते हैं। इसी प्रकार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है सरकार उनकी नियुक्ति को कैसे उक्त कानून से बाहर कर सकती है।

उन्होंने राज्यपाल से मांग की कि जिस अधिकारी ने यह काम किया है उसकी जांच कराकर कार्रवाई की जाए। बकौल रीता जोशी राज्यपाल ने उन्हें आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया। रीता जोशी ने कहा कि इससे पहले सरकार ने नागरिक उड्डयन विभाग को चुपचाप तरीके से सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया था। इसकी भी किसी को भनक नहीं लगी। अब सूचना के अधिकार कानून के तहत वे पता करेंगी कि और कितने विषयों को इससे बाहर किया गया है।

उन्होंने कहा कि यह सरकार हर क्षेत्र में मनमानी कर रही है। डेढ़ साल से गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों का कार्ड नहीं बनाया गया। अगली लड़ाई उनकी बीपीएल कार्ड बनाने तथा सच्चर कमेटी की सिफारिशों को ठीक ढंग से लागू न किये जाने के खिलाफ होगी। राज्यपाल को ज्ञापन देने वालों में विधानमंडल दले के नेता प्रमोद तिवारी, सूचना का अधिकार टास्क फोर्स के अध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह कुछ अधिवक्ता तथा प्रवक्ता द्विजेन्द्र त्रिपाठी आदि थे।

विधिवेत्ताओं की राय

-पूर्व राज्यपाल एवं संविधानवेत्ता आरके त्रिवेदी का मत है कि अधिसूचना जारी करने के लिए राज्यपाल का अनुमोदन जरूरी नहीं। ऐसी बाध्यता सिर्फ नया कानून लागू करने में होती है। अधिसूचना सरकार खुद जारी कर सकती है।

-पूर्व महाधिवक्ता वीरेन्द्र भाटिया का कहना है कि सूचना का अधिकार केन्द्रीय कानून है। इसमें कटौती या संशोधन करने के लिए राज्यपाल व राष्ट्रपति की अनुमति जरूरी है। राज्य सरकार ने सीधे अधिसूचना जारी करके विधिविरुद्ध कार्य किया।

-राज्यपाल के पूर्व सलाहकार सीबी पाण्डेय का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना अवैध है। इसमें सूचना का अधिकार कानून तथा इसकी धारा-8 में उल्लिखित प्राविधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया गया है।

-विधिवेत्ता हरि शंकर जैन का कहना है कि सूचना का अधिकार जैसे केंद्रीय कानून में कटौती या संशोधन की अधिसूचना जारी करने से पहले राज्यपाल का अनुमोदन जरूरी है, ताकि राज्य सरकार का कदम विधिविरुद्ध प्रतीत होने पर राज्यपाल वह विषय राष्ट्रपति को सन्दर्भित कर सकें।

क्या है आरटीआई कानून की धारा 24

सूचना का अधिकार कानून 2005 के अध्याय पांच की धारा 24 की उपधारा (4) में यह प्रावधान किया गया है कि सुरक्षा (सेक्योरिटी) एवं अभिसूचना (इंटेलीजेंस) के मामलों को इस कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए राज्य सरकार समय-समय पर अधिसूचना जारी कर सकती है किन्तु ऐसे मामलों को बाहर नहीं किया जा सकता जो भ्रष्टाचार व मानवाधिकार हनन से सम्बन्धित हैं। विशेषज्ञों की राय में सरकार ने 2 जून को जो अधिसूचना जारी की उसका सुरक्षा व इंटेलीजेंस से कोई ताल्लुक नहीं है बल्कि इससे भ्रष्टाचार पर एक तरह से पर्दा डालने का प्रयास किया गया है।

वे विषय जो 2 जून को आरटीआई से बाहर किए गए:-

राज्यपाल की नियुक्ति, मंत्रियों, राज्य मंत्रियों, उप मंत्रियों व महाधिवक्ता की नियुक्ति, राज्यपाल की तरफ से राष्ट्रपति को किये जाने वाला पत्राचार, उत्तर प्रदेश कार्य नियमावली 1975 की अधिसूचनाएं, सचिवालय अनुदेश संशोधन व व्याख्या, कार्य बंटवारा, नियमावली 1975 की अधिसूचनाएं, भारत सरकार के एलोकेशन आफ रूल्स आफ बिजनेस, अन्य राज्यों की कार्य नियमावली, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति आदि। इसके अलावा मंत्रियों व संसद सदस्यों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों की जांच, साइफर कार्य तथा पद्म पुरस्कारों से सम्बन्धित सभी कार्यो को भी इस अधिसूचना के जरिए आरटीआई से बाहर कर दिया गया था।



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