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राजनाथ की प्रतिष्ठा पश्चिमी यूपी से जुड़ी

on अप्रैल 28,2009

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भाजपा राष्ट्र्ीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के इस बार गाजियाबाद संसदीय सीट से चुनाव लड़ने के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बना है।

कभी भाजपा के गढ़ रहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद क्षेत्र के लिए एक बार फिर भाजपा को पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के विरोध की परवाह ना करते हुए रालोद के अजित सिंह का सहारा लेना पड़ा है क्योंकि यह चुनाव भाजपा के प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।

साफ है कि राजनाथ सिंह के लिए खुद के चुनाव जीतने की ही नहीं बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति सुधारने की भी कड़ी चुनौती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की जैसी दयनीय स्थिति है उसके मद्देनजर यह सही भी है कि यदि यहां भाजपा अपना प्रदर्शन सुधारने में सफल होती है तो उसका सीधा श्रेय राजनाथ सिंह को ही जाएगा। वहीं अगर प्रदर्शन शर्मनाक रहता है तो भाजपा में राजनाथ सिंह विरोधी हवा का तेज होना तय है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो पता चलता है कि इस क्षेत्र में भाजपा का उदय राम लहर के चलते 1991 के चुनाव में हुआ था।

वर्ष 1991 में हुए चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश की 23 में से 15 सीटों पर कामयाबी मिली थी जबकि आधा दर्जन सीटों पर भाजपा दूसरे नंबर पर रही थी। लगभग यही स्थिति अगले चुनाव यानी 1996 में रही जिसमें भाजपा की 13 सीटें मिली। पांच स्थानों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे।

इसके बाद 1998 के चुनाव में भाजपा ने 17 सीटों पर अपनी सफलता के झंडे गाड़ कर राजनीतिक हलकों में अपनी धाक जमा ली थी। इस चुनाव में भगवा लहर के चलते अजित सिंह तक को बागपत में शिकस्त का सामना करना पड़ा था। लेकिन इसके बाद भाजपा का ग्राफ लगातार गिरना शुरू हुआ जो पिछले चुनाव तक जारी रहा। वर्ष 1999 के चुनाव में भाजपा की सीटों की संख्या घटकर आधी से भी कम हो गई यानी सिर्फ सात रह गई। 11 स्थानों पर भाजपा को दूसरे नंबर पर रहकर संतोष करना पड़ा।

इस चुनाव में भाजपा के हाथ से 1998 के चुनाव में जीती हुई मेरठ, अमरोहा, रामपुर, आंवला, शाहजहांपुर, फिरोजाबाद, आगरा, बागपत, मुजफ्फरनगर, कैराना और सहारनपुर सीटें हाथ से निकल गई। इनमें मेरठ, फिरोजाबाद, आगरा और मुजफ्फरनगर उन सीटों में शामिल थी जहां भाजपा लगातार पिछले तीन चुनाव 1991 1996 और 1998 जीत चुकी थी। इस चुनाव में सपा से बिजनौर सीट छीनने में भाजपा जरूर सफल रही। यह अलग बात है कि अगले चुनाव में इस सीट पर रालोद ने कब्जा जमा लिया।

वर्ष 2004 के चुनाव में स्थिति और भी बुरी रही। इस चुनाव में भाजपा मात्र बरेली पीलीभीत हाथरस और खुर्जा में जीत सकी। इनमें भी पीलीभीत की जीत मेनका गांधी की अपनी जीत मानी गई थी।

गौरतलब है कि पीलीभीत से मेनका गांधी 1996 में जद के टिकट पर और 1998 1999 का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीती थीं। इस चुनाव में भाजपा के हाथ से बिजनौर मथुरा अलीगढ़ हापुड़ [गाजियाबाद] जैसी उसके गढ़ कही जाने वाली सीटें निकल गई।

दरअसल, जैसा कि इस क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा से सीटें छीनकर बेशक सबसे अधिक नुकसान सपा ने भाजपा को पहुंचाया है। लेकिन बसपा रालोद और कांग्रेस ने भी भाजपा को चोट पहुंचाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। हालांकि इसमें रालोद और बसपा की भूमिका अधिक रही। यह दोनों दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सीटें नाम मात्र की ही जीत सके। लेकिन उनके कट्टर माने जाने वाले मतदाताओं के कारण भाजपा की भगवा लहर 1991 और 1998 जैसी तेजी पकड़ने में सफल नहीं हो सकी जिसका नुकसान भाजपा को चुनाव में उठाना पड़ा।


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