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इंदिरा ने ठाकरे के खिलाफ पूरी ताकत झोंक दी थी

on अप्रैल 11,2009

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मध्यप्रदेश के खंडवा संसदीय क्षेत्र से एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य यह भी जुड़ा हुआ है कि भाजपा के पितृ पुरुष स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने अपने जीवन के दोनों लोकसभा चुनाव इसी सीट से लड़े और तीन दशक पहले दूसरे चुनाव में उन्हें पराजित करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने तीन दिन तक इस क्षेत्र में सघन जनसंपर्क किया था।

भाजपा के अध्यक्ष पद का दायित्व संभाल चुके ठाकरे ने 1979 में यहां हुए उपचुनाव में जनता पार्टी के टिकट पर कांग्रेस के राजनीति के नए-नवेले स्थानीय नवयुवक डा. शिवकुमार सिंह को 38 हजार 486 मतों से शिकस्त दी थी। इसके बाद ठाकरे ने अपने संसदीय जीवन का दूसरा चुनाव वर्ष 1980 में यहीं से लड़ा और उनका मुकाबला फिर से डॉ. सिंह से हुआ।

कांग्रेस की तत्कालीन तेजतर्रार नेता इंदिरा गांधी ने शायद तब इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और उन्होंने पार्टी की विजय सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं रहने दी थी। गांधी ने तीन दिन तक संसदीय क्षेत्र में व्यापक जनसंपर्क किया और दूरस्थ आदिवासी अंचल भी उनकी पहुंच से अछूते नहीं रहे।

शायद यही वजह रही कि इस बार ठाकरे को डॉ. सिंह से 37 हजार 356 मतों से पराजय झेलना पड़ी। राजनीति के जानकारों के अनुसार ठाकरे ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में सिर्फ दो चुनाव इसी क्षेत्र से लड़े। दूसरे चुनाव के समय की स्मृतियां आज भी यहां के लोगों में जस की तस बसी हुई हैं। इंदिरा गांधी का खुली जीप में लगातार जनसंपर्क के जरिए लोगों से आत्मीयता से मिलना अभी भी लोग भुला नहीं पाए हैं।

जानकारों का कहना है कि तब से सभी राष्ट्रीय दलों की निगाहें इस सीट पर लगी रहती हैं। इस बार इस सीट पर मुकाबला भाजपा के वर्तमान सांसद नंदकुमार सिंह चौहान और चौदहवीं लोकसभा में खरगोन का प्रतिनिधित्व करने वाले अरुण यादव के बीच है। यादव पूर्व उप मुख्यमंत्री व पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष यादव के पुत्र हैं जिन्होंने खरगोन के उपचुनाव में भाजपा के एक अन्य दिग्गज कृष्णमुरारी मोघे को पराजित किया था।

परिसीमन के बाद पहली बार हो रहे लोकसभा चुनाव में यादव को खरगोन की बजाय खंडवा से चुनाव लड़ना पड़ रहा है। खरगोन अब अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सीट हो गई है। इस सीट पर राज्य में दूसरे और अंतिम चरण में 30 अप्रैल को मतदान होगा।

वर्ष 1952 के पहले लोकसभा चुनाव से लेकर वर्ष 2004 तक के चुनाव तक यहां हुए 15 चुनाव [एक उपचुनाव भी शामिल] में आठ बार कांग्रेस और सात बार जनता पार्टी तथा भारतीय जनता पार्टी विजयी रही। आजादी के बाद से 1971 तक लगातार पांच चुनावों में कांग्रेस विजयी रही।

वर्ष 1977 में पहली बार कांग्रेस को यहां पराजय का मुंह देखना पड़ा। तब विपक्ष के साझा उम्मीदवार भारतीय लोकदल के परमानंद ठाकुरदास गोविंदजीवाला ने लगातार दो बार सांसद रहे कांग्रेस के गंगाचरण दीक्षित को परास्त किया। गोविंदजीवाला के निधन के कारण हुए उपचुनाव में ठाकरे ने जनता पार्टी की सीट को बचाए रखा।

वर्ष 1980 और 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने अपनी जीत दर्ज की लेकिन वर्ष 1989 में यह सीट कांग्रेस के अंतर्विरोध के चलते भाजपा की झोली में चली गई। वर्ष 1991 में कांग्रेस के महेंद्र सिंह ने पुन: कांग्रेस को जीत दिलाई, लेकिन इसके बाद फिर कभी कांग्रेस यहां जीत का स्वाद नहीं चख सकी।

खंडवा के वर्तमान सांसद चौहान लगातार चार चुनाव जीतकर अपराजेय रहे हैं। उन्होंने 1996 में कांग्रेस के सिंह को 94 हजार से अधिक मतों से और 1998 में सिंह के छोटे भाई तथा पूर्व सांसद महेंद्र कुमार सिंह को 44 हजार से अधिक मतों से शिकस्त दी थी।

उन्होंने 1999 में कांग्रेस के पूर्व मंत्री तनवंत सिंह कीर को एक लाख 26 हजार के रिकार्ड मतों के अंतर से हराया और 2004 में बिल्कुल नए चेहरे के रूप में अमिताभ मंडलोई को मौका दिया लेकिन वह भी एक लाख मतों से ज्यादा के अंतर से पराजित हो गए।



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