वाशिंगटन। अमेरिका में भारत की दिग्गज दवा कंपनी रैनबैक्सी पर स्थायी रोक का आदेश जारी हो सकता है। अमेरिकी न्याय विभाग ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अदालत में कंपनी के कई प्लांटों में बनी दवाओं को यहां बेचने पर पाबंदी लगाने की अर्जी दी है।
अदालती मुहर लगते ही कंपनी अमेरिका में अपनी दवाएं नहीं बेच पाएगी। इन प्लांटों में अमेरिका के अलावा भारत के तीन दवा उत्पादक संयंत्र- पोंटा साहिब और बाटा मंडी [हिमाचल प्रदेश] और देवास [मध्य प्रदेश] शामिल हैं। इन पर अमेरिकी मानकों की अनदेखी करने और आंकडों में हेरफेर का आरोप है।
इस बारे में रैनबैक्सी ने नई दिल्ली में एक बयान जारी अमेरिकी नियमों के पालन करने के लिए प्रतिबद्धता जताई। गुड़गांव स्थित इस कंपनी का जापान की फार्मा फर्म दायची सांक्यो ने जून, 2008 में 4.6 अरब डॉलर में अधिग्रहण कर लिया था।
न्याय विभाग की इस अर्जी में अमेरिका के खाद्य एवं दवा प्रशासन [एफडीए] के साथ कंपनी के सुलह समझौते पर अदालत की स्वीकृति मांगी गई है। इसके अनुसार रैनबैक्सी को दवा बनाने वाले भारतीय कारखानों में साफ-सफाई और उत्पादन के अमेरिकी नियमों और मानकों का पालन करना होगा। कानून विभाग के सहायक अटार्नी जनरल [दीवानी] टोनी वेस्ट ने कहा कि रैनबैक्सी के खिलाफ यह अहम कार्रवाई है। कंपनी को अब अमेरिका और भारत स्थित सभी संयंत्रों में आमूलचूल बदलाव करने होंगे। इसके तहत कंपनी को संबंधित काखानों की आतरिक समीक्षा के लिए बाहरी विशेषज्ञ रखने होंगे। ये प्रभावित प्लांटों की पूरी छानबीन करेंगे। इनसे जुड़े आंकड़ों व तथ्यों की भी ऑडिट होगी। इस तरह ये विशेषज्ञ सुनिश्चित करेंगे कि अब आगे नियमों का किसी भी तरह उल्लंघन नहीं हो।
कंपनी ने बताया कि एफडीए के साथ 20 दिसंबर, 2011 को उसका समझौता हो गया था। अब इस पर सहमति के आदेश के लिए मेरीलैंड की जिला अदालन में अर्जी लगाई गई है। कंपनी ने अमेरिका के न्याय विभाग के साथ सुलह के लिए उसने 50 करोड़ डॉलर [करीब 2,500 करोड़ रुपये] की व्यवस्था भी कर रखी है। इस बारे में रैनबैक्सी के सीईओ व एमडी अरुण साहनी ने कहा, 'ताजा घोषणा एफडीए के साथ हुए हमारे समझौते को पुख्ता करने की प्रक्रिया का अगला कदम है ताकि इस पुराने मामले को खत्म किया जा सके।'
क्या था मामला
-एफडीए ने पोंटा साहिब, बाटा मंडी व देवास प्लांटों में अमेरिकी नियमों और स्वच्छता मानकों के उल्लंघन के खिलाफ चेतावनी जारी की थी। साथ ही यहां बनने वाली 30 जेनरिक की दवाओं को अमेरिका भेजने पर पाबंदी लगा दी थी। इनमें ग्लोवर्सविले प्लांट भी शामिल था, जिसे कंपनी पहले ही बंद कर चुकी है।
अमेरिका के कानून विभाग ने उसी साल कंपनी पर दस्तावेजों में हेराफेरी और धाधली के आरोप में वहा की अदालत में मामला दायर किया था।