भारतीय नौसेना अपने बेड़े में डीजल और बिजली से चलने वाली नई पीढ़ी की पनडुब्बियां चाहती है। रक्षा मंत्रालय ने पचास हजार करोड़ की इस परियोजना को सैद्धांतिक सहमति दे दी है। बस, मामला इनके निर्माण के लिए निजी गोदी की तलाश पर अटक गया है। इस परियोजना के तहत छह पनडुब्बियों का निर्माण होना है। रक्षा मंत्री एके एंटनी की अध्यक्षता में हाल में हुई डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल [डीएसी] की बैठक में इस दूसरी निर्माण परियोजना की जरूरत पर गंभीरता से विचार-विमर्श हुआ और परियोजना को सहमति दी गई।
रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ सूत्र ने बताया कि इस परियोजना को 75आई कूटनाम दिया गया है। मंत्रालय चाहता है कि इस परियोजना के लिए पूरी तरह निजी क्षेत्र को शामिल किया जाए। वजह यह है कि मुंबई स्थित रक्षा लोक उपक्रम मझगांव डाक्स लि. [एमडीएल]पर पहले से ही कार्य का बोझ है।
सूत्र के मुताबिक इन पनडुब्बियों के निर्माण के लिए रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम और निजी क्षेत्र की गोदी का उपयोग किया जा सकता है। इनमें एमडीएल, विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड और एल एंड टी की गोदी समेत कुछ निजी जहाज कारखाने शामिल हैं।
सूत्र ने कहा कि हम चाहते हैं कि निजी कारखाने आगे आएं और कहें कि वे इस परियोजना को लेने के लिए तैयार हैं। नौसेना ने डीएसी को सुझाया है कि इस परियोजना की पहली दो पनडुब्बियों के निर्माण के लिए विदेशी कारखानों व विदेशी फर्मो की मदद ली जाए। उसके बाद बची हुई चार पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही कराया जाए।
इसके पीछे नौसेना ने तर्क दिया था कि एमडीएल अभी और जहाजों के निर्माण की जिम्मेदारी नहीं ले सकता। अभी वह कूटनाम 75 परियोजना की छह स्कॉर्पियन पनडुब्बियों का निर्माण कर रहा है। वह परियोजना पहले ही तीन साल विलंब से चल रही है और उस परियोजना की पहली पनडुब्बी नौसेना को 2012 तक ही मिल पाएगी। पनडुब्बियों के निर्माण के तीसरे चरण में भारत में ही बारह पनडुब्बियों के निर्माण की योजना है। तब तक भारत खुद पनडुब्बी निर्माण की तकनीक, विशेषज्ञता और क्षमता हासिल कर लेगा। नौ सेना के पास फिलहाल पंद्रह पनडुब्बियां ही हैं।