अमेरिकी और यूरोपीय बैंकों के वित्तीय संकट से सबक लेते हुए रिजर्व बैंक ने निजी क्षेत्र के बैंकों पर अपने शीर्ष अधिकारियों को वेतन देने के मामले में अंकुश लगाया है। आरबीआई ने निजी बैंकों के सीईओ व अन्य डायरेक्टरों की सालाना वेतन वृद्धि की न केवल सीमा तय कर दी है, बल्कि खराब प्रदर्शन करने वाले बैंको के शीर्ष अधिकारियों के वेतन में कटौती का भी प्रावधान किया है। रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को निजी बैंकों में शीर्ष प्रबंधन को दिए जाने वाले पैकेज पर अपनी नीति का मसौदा जारी किया है। इसमें कहा गया है कि निजी बैंक अपने सीईओ या अन्य डायरेक्टरों के वेतन में हर साल 15 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि नहीं कर सकते। साथ ही बैंकों को यह व्यवस्था करनी होगी कि वेतन बढ़ोतरी के हर प्रस्ताव पर निदेशक मंडल की स्वीकृति ली जाए। इन बैंकों को यह भी कहा गया है कि अपने शीर्ष अधिकारियों को मुआवजा के तौर पर भुगतान करने की साफ नीति होनी चाहिए। साथ ही इस नीति में संशोधन की भी हमेशा गुंजाइश होनी चाहिए। भारत में काम करने वाले विदेशी बैंक, क्षेत्रीय बैंक व निजी बैंकों को इस बारे में नीति बनाकर केंद्रीय बैंक से अनुमति लेनी होगी।
आरबीआई की इस नीति के मुताबिक हर निजी बैंक एक समिति का गठन करेगा, जो बैंक के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगा। नीति में हर तरह के जोखिम का मुआवजा देने की व्यवस्था होगी। पूर्णकालिक डायरेक्टरों और सीईओ के बारे में कहा गया है कि उनके सालाना वेतन में हर वर्ष 10-15 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि नहीं की जा सकती। कुल मुआवजा यानी वेतन को नकदी, शेयर या अन्य किसी प्रपत्र में विभाजित किया जा सकता है। कुल वेतन में गैर-स्थायी भुगतान का हिस्सा 40 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
वर्ष 2008-09 के ग्लोबल वित्तीय संकट के बाद विश्व के तमाम देशों में निजी बैंकों में वेतन पैकेज देने पर सीमा लगाई जा रही है। अमेरिका में कई बैंक जो दीवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके थे, सरकारी मदद से अपने सीईओ व अन्य शीर्ष अधिकारियों को मोटी पगार देते पाए गए थे। कई बैंकों ने सरकार से प्राप्त वित्तीय पैकेज का इस्तेमाल अपने शीर्ष अधिकारियों को वेतन देने में किया। यह स्थिति भारत में न आए, यही कारण है कि रिजर्व बैंक पहले से ही तैयारी कर रहा है। विकसित व भारत जैसे प्रमुख विकासशील देशों के संगठन जी-20 की बैठक में भी एक वर्ष पहले इस बारे में आम सहमति बनी थी।