एक पूर्व अमेरिकी राजनयिक ने बुधवार को कहा कि ओबामा प्रशासन पूर्व के प्रशासनों की तुलना में पाकिस्तान को एक अलग नजरिए से देख रहा है और नई अमेरिकी सरकार कश्मीर को सुर्खियों में न रखते हुए उस पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। पाकिस्तान में अमेरिका के राजनयिक रहे विलियम मिलम ने भारत और कश्मीर को उन मुद्दों में से एक माना है जिन पर ओबामा प्रशासन पाकिस्तान के लिए समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करते हुए ध्यान केंद्रित करेगा। वर्ष 1998 से 2001 के बीच इस्लामाबाद में रहे मिलम ने कहा कि एक और बात है जो काफी संवेदनशील है कि मेरे विचार से यह प्रशासन इस मुद्दे पर ध्यान तो केंद्रित करेगा पर इस पर दृढ़ बने रहना मुश्किल होगा, क्योंकि इसे सुर्खियों से दूर एक आवरण ओढ़ाकर रखा जाएगा।
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने जो कुछ किया, कम से कम विदेश मामलों और सुरक्षा मुद्दों पर, उसे भारत के नजरिए से देखा गया और यह दृष्टिकोण भारत के लिए उसे [पाकिस्तान को] तल्ख रिश्तों वाला पड़ोसी बताता है।
मिलम ने अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के समक्ष अपना वक्तव्य देने से पहले कहा, 'ऐसा कर सकने का बेहतर तरीका है। हम निश्चित तौर पर मुद्दों और खासकर कश्मीर मसले पर दखलंदाजी या हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लेकिन हमें असल में इसके लिए काम करना होगा।'
नए अमेरिकी प्रशासन की पाकिस्तान के प्रति नीति पर अपना आकलन पेश करते हुए मिलम ने कहा कि उनके लिए यह बात स्पष्ट है कि ओबामा प्रशासन पाकिस्तान को पूर्व प्रशासनों के नजरिए से कुछ अलग एक नए चश्मे से देखता है और देख रहा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक सहयोगी बना हुआ है और यह अमेरिका का एक अहम सहयोगी है। लेकिन हमारा ध्यान ज्यादा खुले तरह के रिश्तों से हटकर ऐसे संबंधों पर केंद्रित हो रहा है जो पाकिस्तान की मानसिकता और पाकिस्तानियों की मानसिकता बदलने से जुड़ा है। यह उनके देश के समक्ष मौजूद खतरों से निपटने या उनसे लड़ने से संबंधित है।
मिलम ने कहा, 'सैन्य पक्ष में, मेरे विचार से ज्यादा ध्यान अब उग्रवाद विरोधी अभियानों, उपकरणों और प्रशिक्षण पर केंद्रित रहेगा जो पाकिस्तानी सेना के लिए जरूरी है।' उन्होंने कहा कि अब अमेरिकी सहयोग आर्थिक प्रकृति का ज्यादा होगा।
मिलम ने कहा, 'मेरा मानना है कि प्रशासन आर्थिक मदद तीन गुना बढ़ाएगा। यह अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए होगा जो बेहद भयानक स्थिति में है। मुझे उम्मीद है कि लंबे समय के लिए सामाजिक विकास और विशेषकर शिक्षा के लिए कुछ मदद मुहैया करानी होगी, क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं जन शिक्षण प्रणाली ढह जाने की कगार पर है।'
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