नई दिल्ली। उद्योग जगत को सरकार के बढ़ते वित्तीय घाटे की चिंता सताने लगी है। उद्योग जगत का मानना है कि वित्तीय घाटा बढ़ते जाने से सरकार की उधारी बढे़गी उससे वित्तीय तंत्र पर दबाव बढे़गा, परिणामस्वरूप फिर से ब्याज दरें बढ़ने का दौर शुरू हो सकता है।
देश के उद्योग जगत का प्रतिनिधित्व करने वाले वाणिज्य एवं उद्योग मंडलों को जहां एक तरफ आर्थिक मंदी का दौर लंबा खिंचने की चिंता सता रही है वहीं दूसरी तरफ सरकार के राजकोषीय घाटे के हद से बाहर चले जाने से उनके माथे पर बल पड़ने लगे हैं। पीएचडी वाणिज्य एवं उद्योग मंडल के मुताबिक केंद्र सरकार का वित्तीय घाटे अगले वित्त वर्ष में 5.5 प्रतिशत से अधिक हो सकता है। इस घाटे की भरपाई के लिए अगले वित्त वर्ष में सरकार बाजार से 3,32,835 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाएगी। राज्यों को भी उनके लिए तय सीमा से अधिक पूंजी उठाने की अनुमति दी गई है। इस प्रकार केंद्र और राज्यों की कुल उधारी कहीं अधिक हो सकती है। इतना धन जब सरकारें उठाएंगी तो उद्योग एवं व्यापार जगत के लिए बाजार में कुछ ज्यादा नहीं बचेगा जिसका सीधा असर ब्याज दरें बढ़ने के रूप में सामने आएगा।
एसोसिएट चैंबर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया [एसोचैम] ने एक सर्वेक्षण में पाया कि मंदी का दौर अगले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही तक खिंच सकता है। सर्वेक्षण में शामिल ज्यादातर उद्यमियों का मानना था कि अमेरिका और यूरोप में जल्द सुधार की उम्मीदें नहीं दिखाई दे रही हैं। ऐसे में डालर के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ने का फायदा भी नहीं मिल पा रहा है। उनके मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था में जो भी सुधार आएगा वह घरेलू खपत बढ़ने और सरकारी निवेश के फलस्वरूप ही होगा।
पीएचडी मंडल ने केंद्र सरकार के वित्तीय लेखे जोखे का विश्लेषण करते हुए कहा है कि सरकार ने इस साल वित्तीय मजबूती के प्रयास को छोड़ दिया। विश्व मंदी के प्रभाव से घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने की मजबूरी तो थी ही खाद्यान्न, उवर्रक और पेट्रोलियम पदार्थो पर दी जाने वाली सब्सिडी को भी खुले हाथ छोड़ दिया गया। सरकार के प्रमुख जन कल्याणकारी कार्यक्रमों, छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने में भी काफी व्यय बढ़ गया। पेट्रोलियम बाड, उवर्रक और खाद्य सब्सिडी बाड जिन्हें बजट से बाहर रखा गया है उन्हें भी यदि शामिल कर लिया जाए तो चालू वित्तीय वर्ष में ही केंद्र सरकार का कुल घाटा जीडीपी के आठ प्रतिशत तक हो जाएगा। बहरहाल, बजट में वित्तीय घाटे के छह प्रतिशत रहने का संशोधित अनुमान लगाया गया है।
उधर, एसोचैम बिजनेस बेरोमीटर सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 237 उद्यमियों में से 84 प्रतिशत ने शंका जताई कि कारोबार और व्यवसाय में अगले साल के मध्य तक सुस्ती का माहौल बना रहेगा। हालांकि 77 प्रतिशत ने यह भी माना है कि भारत में आर्थिक् सुस्ती का दौर अमेरिका और यूरोप की तुलना में जल्द दूर होगा। विदेशी मंदी का असर यह हुआ कि निर्यात मांग तेजी से नीचे आ गई, औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि समाप्त हो गई, बल्कि इसमें गिरावट आने लगी और कई क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों पर कैंची चलने लगी।
उद्यमियों को उम्मीद है कि वर्ष 2009 के अंत तक भारत की घरेलू मांग की बेहतर संभावना को देखते हुए निवेशकों का आकर्षण बढ़ेगा। अमेरिकी फैडरल रिजर्व प्रमुख ने जहां उम्मीद जताई है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था 2009 के अंत तक मंदी से उबर जाएगी वहीं भारतीय उद्यमी मानते हैं कि ऐसा 2010 के आखिर तक ही हो पाएगा। उन्हें घरेलू मोर्चे पर वित्तीय घाटे को लेकर बढ़ती चिंता भी सता रही है।
पीएचडी मंडल के मुताबिक वर्ष 2009-10 के अंतरिम बजट में केंद्र का राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.5 प्रतिशत और राजस्व घाटा 4.0 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए 332835 करोड़ रुपये सरकार विभिन्न उधारियों से जुटाएगी। जीडीपी के मुकाबले राजकोषीय घाटे का अनुपात कम होने के बावजूद राशि बढ़ी है। उद्योग मंडल का कहना है कि चार साल तक लगातार वित्तीय मोर्चे पर सुधार और मजबूती लाने के बाद 2008-09 में स्थिति ढीली ढाली नजर आने लगी। अंतरिम बजट में इस साल वित्तीय घाटा 6 प्रतिशत और अगले साल 5.5 प्रतिशत अनुमानित है। केंद्र और राज्यों का सकल वित्तीय घाटा 11 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान है।
अगले वित्त वर्ष के लिए भी परिस्थितियां अनुकूल नजर नहीं आती हैं। ऐसे में सरकार की ज्यादा कमाई उधारी की देनदारियों और ब्याज भुगतान में ही चली जाएगी। जरूरी निवेश कार्यो के लिए थोड़ी बहुत राशि ही बचेगी।
पीएचडी मंडल के मुताबिक भारी वित्तीय घाटे का अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ता है। ब्याज दरें और महंगाई पर फिर से दबाव बन सकता है। इसलिए सरकार को इस मोर्चे पर गौर करना चाहिए और व्यय सुधार के साथ साथ सब्सिडी के मोर्चे पर भी हाथ कसना होगा। गैर-प्राथमिकता वाली सब्सिडियों के मामले में सरकार को सतर्कता बरतनी होगी। उद्योग मंडल ने कहा है कि खर्चे पर अंकुश इसलिए भी जरूरी है कि मंदी के इस दौर में सरकार की राजस्व कमाई में भी वृद्धि धीमी रहेगी। अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिले ही सरकार को अपनी वित्तीय स्थिति को फिर से स्वस्थ मंच पर लाना होगा।