भाजपा का अंदरूनी कलह शुक्रवार को खुल कर सामने आ गया। पार्टी संगठन में पूर्वोत्तर राज्यों के सह प्रभारी पद पर सुधांशु मित्तल की नियुक्ति के खिलाफ महासचिव अरुण जेटली ने केंद्रीय चुनाव समिति का बायकाट कर दिया। भाजपा में संगठन स्तर पर नियुक्तियों से लेकर टिकट बंटवारे तक में असंतोष उभर रहे थे। अब बड़े नेताओं के आमने-सामने आने से संकट गहरा गया है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह व जेटली अपने-अपने रुख पर अड़े हैं। दोनों में से कोई भी नरम नहीं पड़ा तो पार्टी का असंतोष चरम पर जा सकता है।
मौजूदा विवाद की मुख्य वजह नौ मार्च को पूर्वोत्तर राज्यों के सह प्रभारी पद पर हुई सुधांशु मित्तल की नियुक्ति रही। जेटली ने उसी समय पार्टी अध्यक्ष से इस पर असहमति जताते हुए कहा था कि इस नियुक्ति से मुश्किल होगी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने जेटली को समझाने की भी कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बनी। सूत्रों का कहना है कि जेटली ने सोनी को साफ कर दिया कि उन्हें जो जिम्मेदारी दी जाएगी उसे एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में पूरी तरह निभाएंगे। इसके बाद शुक्रवार को हुई पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में जेटली नहीं आए। सूत्रों के अंदर पार्टी के भीतर काफी समय से स्थिति असहज थी। मित्तल की नियुक्ति के बाद असंतोष सतह पर आ गया।
मित्तल पहले भी विवादों में रह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव में भाजपा के विरोध के बावजूद वह चुनाव मैदान में उतरे थे और मुख्तार अंसारी आदि ने उनका समर्थन किया था। सूत्रों के अनुसार पार्टी में कुछ नेताओं ने तर्क दिया था कि असम गण परिषद के सुझाव पर मित्तल की नियुक्ति की गई है। पार्टी के एक बड़े नेता ने इसे हास्यास्पद बताते हुए कहा कि यदि दूसरे सहयोगी दल भी ऐसी ही मांग रखने लगे तो क्या पार्टी उन्हें भी मान लेगी।
बहरहाल, दिन में हुई केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक का बायकाट करने के बाद शाम को आडवाणी के निवास पर दिल्ली के उम्मीदवारों का मामला सुझाने के लिए हुई बैठक में जेटली शामिल हुए। इस बैठक में राजनाथ सिंह भी पहुंचे।
सूत्रों के अनुसार, जेटली ने संकेत दिए हैं कि उनका राष्ट्रीय अध्यक्ष से कोई विवाद नहीं है। उनकी जो आपत्ति थी, वह दर्ज करा दी गई है। उन्होंने पहले भी पार्टी में डी.पी. यादव के आने का विरोध किया था। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें पार्टी से हटा दिया था। बताया जाता है कि राजनाथ सिंह ने भी साफ किया है कि मित्तल की नियुक्ति में आडवाणी की सहमति ली गई थी।
पार्टी में शुक्रवार को जो कुछ हुआ उससे यह तो साफ है कि किसी एक को पीछे हटना होगा, नहीं तो असंतोष और भी ज्यादा गहराएगा। यही नहीं, यदि बड़े नेताओं के बीच ऐसे मतभेद होंगे तो अनुशासनहीनता के मामलों में ढील देनी पड़ेगी।