बुश प्रशासन के एक अहम कूटनीतिज्ञ ने राष्ट्रपति बराक ओबामा पर आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति भारत और अमेरिका के बीच सहयोग की ओर कम ध्यान दे रहे हैं और कई संवेदनशील मुद्दों पर अभी भी रिश्तों में गतिरोध है। पिछले प्रशासन में राजनीतिक मामलों के विदेश उपमंत्री रहे निकोलस बर्न्स ने कहा कि ओबामा प्रशासन अफगानिस्तान में लड़खड़ाते युद्ध और कमजोर तथा अस्थिर पाकिस्तान को सही रास्ते पर लाने के मामले में अपना ध्यान सही तरीके से केंद्रित किए हुए हैं, लेकिन वह क्लिंटन और बुश काल की एक बड़ी उपलब्धि को और आगे बढ़ाने पर पूरा ध्यान नहीं लगा रहे हैं, जो है भारत के साथ लंबे समय की मित्रता और सहयोग बनाना।
बुश प्रशासन के दौरान परमाणु करार वार्ता में अहम भूमिका निभाने वाले बर्न्स ने कहा कि अमेरिकियों के लिए आने वाली आधी सदी में कई मुद्दे बहुत अहम रहेंगे क्योंकि सत्ता का वैश्विक संतुलन एशिया की ओर झुक रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस सप्ताह वाशिंगटन में है, पर भारत-अमेरिका के संबंधों में कई मुद्दों पर गतिरोध है। बर्न्स ने बोस्टन ग्लोब के संपादकीय में मंगलवार को कहा कि प्रभावशाली भारतीय शिकायत करते हैं कि ओबामा प्रशासन भारत पर रणनीतिक प्राथमिकताओं को कम कर रहा है, ताकि स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों पाकिस्तान और चीन की ओर से विरोध न पैदा हो। उनकी चिंता यह है कि ओबामा प्रशासन इस मूल बात को समझ नहीं रहा है कि वैश्विक शक्ति के तौर पर भारत का नाटकीय उद्भव अमेरिका के भी हित में है। बर्न्स ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति बराक ओबामा की ह्वाइट हाउस में मुलाकात के दिन प्रकाशित अपनी टिप्पणी में ये बात कही। उन्होंने याद दिलाया कि इस बात में कोई शक नहीं है कि ओबामा का मनमोहन को पहला राजकीय अतिथि बनाने का फैसला एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन फिर भी दोनों देशों के बीच संबंध आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, व्यापार और सबसे जरूरी, भविष्य में ईरान पर प्रतिबंधों जैसे अहम मुद्दों पर एक जैसे नहीं हैं।
बर्न्स ने कहा कि स्पष्ट तौर पर कहूं, तो भारत इनमें से कई मुद्दों पर कठिन और जटिल सहयोगी है, खास तौर पर जलवायु परिवर्तन के मामले में, लेकिन ओबामा अपने पूर्ववर्तियों द्वारा तय रास्ते पर और अधिक सशक्त तौर पर काम कर सकते हैं। संयुक्त वक्तव्य जारी होने के पूर्व प्रकाशित हुए लेख में बर्न्स ने लिखा है कि ओबामा अमेरिका के मध्यपश्चिमी उन संस्थानों की मदद का प्रस्ताव दे सकते हैं, जो चार दशकों पूर्व भारतीय खाद्य उत्पादन में ऐतिहासिक भूमिका प्राप्त करने के केंद्रब्रिदु थे। ओबामा शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत कर सकते हैं। ओबामा इसके लिए अंतरिक्ष शोध और पर्यावरण प्रोद्योगिकियों के क्षेत्र में अहम सहयोग का प्रस्ताव दे सकते हैं। बर्न्स ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत अमेरिका का प्राकृतिक सैन्य सहयोगी है, जिसके दक्षिण एशिया और अन्य स्थानों पर आतंक से लड़ने में वैसे ही हित हैं, जैसे अमेरिका के हैं। उन्होंने कहा कि ओबामा को दोनों देशों के बीच मजबूत रणनीतिक संबंधों के लिए और दबाव डालना चाहिए। उन्होंने कहा कि अमेरिका को भारत-पाकिस्तान को लंबित समग्र वार्ता शुरू करने, द्विपक्षीय तनाव कम करने और कश्मीर मुद्दे पर बात आगे बढ़ाने के लिए और काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अमेरिका भविष्य में चीन की उभरती ताकत को चुनौती के रूप में देख रहा है, ऐसे में भारत-अमेरिका सहयोग को नए सिरे से कायम करना उन सभी कार्यों के लिए जरूरी हैं, जो हम एशिया में पूरे होते देखना चाहते हैं।