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राजनीतिक फिल्म मानते हैं गुलाल को कश्यप

on मार्च 12,2009

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शुक्रवार को पूरे भारत में रिलीज हो रही गुलाल को उसके निर्देशक अनुराग कश्यप राजनीतिक फिल्म मानते हैं। रिलीज की पूर्व संध्या पर दैनिक जागरण से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि मेरी फिल्म को राजनीतिक रूप से जागरूक दर्शक आसानी से समझ लेंगे। हां, अगर कोई इस देश की राजनीति और समाज से कटा हुआ है तो उसे मेरी फिल्म समझने में दिक्कत होगी। मेरी फिल्म छात्र राजनीति से शुरू होती है, लेकिन बाद में राजनीति से जुड़े दूसरे मुद्दों की भी बात करती है। समाज में खिंची जा रही हर तरह की लकीरों की बात है मेरी फिल्म में। धर्म, भाषा, जाति,समुदाय और प्रदेशों के आधार पर बांटने के राजनीतिक स्वार्थ से हमारा समाज बदहाली की ओर जा रहा है। अगर हम अपनी दुनिया को आज के रूप में बचा लें तो भविष्य सुधर सकता है। फिल्म में कोई एक सच्ची घटना या प्रसंग नहीं है, लेकिन फिल्म देखते हुए आप पाएंगे कि हमारे आसपास रोजाना ऐसी घटनाएं हो रही हैं। जगह, नाम और समय अलग हो सकते हैं, किंतु घटनाओं के पीछे का सच एक जैसा ही है, फिल्म की वास्तविकता के बारे में कहा अनुराग कश्यप ने। उन्होंने अपनी बात जारी रखी,फिल्मों में हम सच्ची और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर ही कहानी बुनते हैं। लेखक और निर्देशक ऐतिहासिक सच को कल्पना और किरदारों से जोड़ता है। अनुराग कश्यप ने गुलाल के संदर्भ में किसी भी प्रकार के विवाद की संभावना से इनकार किया। उन्होंने कहा, दर्शक या आम जन के दिमाग में ऐसे सवाल नहीं उठते। कुछ स्वार्थी तत्व जरूर विवाद खड़े करते हैं। ऐसे विवादों के पीछे उनका राजनीतिक हित रहता है। मुझे नहीं लगता कि मेरी फिल्म को लेकर कोई विवाद होगा। गुलाल में रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी की पंक्तियों का प्रासंगिक उपयोग हुआ है, ऐसा बताया अनुराग ने। उन्होंने कहा कि हम पहले धूमिल की कृति संसद से सड़क तक की पंक्तियां इस्तेमाल करना चाहते थे। फिल्म के गीतकार और संगीतकार पियूष मिश्रा ने मुझे दिनकर की पंक्तियां सुनायीं। महाभारत के प्रसंग में दिनकर की कही बातें आज भी प्रासंगिक और भावपूर्ण हैं। इससे मेरी फिल्म को गहराई मिल गई। मुझे लगता है कि हमें अपनी फिल्मों में साहित्यिक संदर्भो का इस्तेमाल करना चाहिए। अनुराग कश्यप की राय में हिंदी के पापुलर सिनेमा ने दर्शकों की रुचि बिगाड़ दी है। ज्यादातर निर्देशक अपनी सुविधा के लिए फूहड़ता और अश्लीलता को मनोरंजन का नाम दे देते हैं। कोई भी फिल्म आपको बांधती है तो वह मनोरंजक हो जाती है। एक धारणा है कि अनुराग की फिल्में दुरूह और चौंकाने वाली होती है। अनुराग कश्यप ने इस धारणा से असहमति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया, चूंकि फिल्मों में दर्शकों ने अपने आसपास की दुनिया नहीं देखी है, इसलिए वे मेरी फिल्मों से चौंकते हैं। मैं अपने नजरिए से दर्शकों के बीच अपनी राय और सोच रखता हूं। अनुराग ने आगे कहा कि गुलाल देश के उन साहित्यकारों को समर्पित है, जो सम्यक समाज का सपना देखते थे। उनकी यह दुनिया राजनीतिक स्वार्थ में बिगड़ती ही जा रही है। देश के युवक ही इस दुनिया को संभाल सकते हैं।

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