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जीत का जश्न बंद और कत्ल के सहारे

on अक्तूबर 06,2009

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कभी लालगढ़ में ममता बनर्जी के लिए वोट मागते रहे नक्सली नेता छत्रधर महतो की चालाकी से की गई गिरफ्तारी नक्सलियों को अनैतिक लगती है। उन नक्सलियों को जो गोरिल्ला युद्ध में पारंगत हैं और अपने लिए अपने से तय दुश्मन के खिलाफ हमले के क्रूर से क्रूर तरीके को जायज मानते हैं।

नक्सलवाद के विस्तार के लिए हर दिन नरसंहार की रणनीति पर काम करना उन्हें नाजायज नहीं लगता है। बिहार के खगड़िया जैसे छोटे जिलों में तो उन्हें नक्सलवाद के विस्तार के लिए जातिवादी तत्वों का पोषण जायज नजर आता है, वही उन्हें अपने नेता की झासे से गिरफ्तारी गलत लगती है। यह नक्सलवाद का वह तरीका है, जिसे किसी भी सामान्य समझ से समझ लेना मुश्किल है।

हा, जो जानते हैं उनको बखूबी पता है कि बंद नक्सलियों का औजार बन गया है। शासन प्रशासन को भयभीत करने और इलाके में मौजूदगी दर्ज कराने के लिए इन बंद का आह्वान धड़ल्ले से किया जा रहा है। कभी छत्रधर महतो की गिरफ्तारी के विरोध के बहाने भारत बंद तो कभी बात-बेबात प्रभावित इलाकों में बंद बुला लेना नक्सलियों के लिए अपने बढ़ती ताकत को आजमाने का लिटमस टेस्ट है। वे इस टेस्ट में सफल होते दिख भी रहे हैं।

जनता से हिम्मत करने की उम्मीद जताने वाले पुलिस अधिकारी हालत की भयावहता बयान करते हुए पुलिस महकमे में भी मनोबल ऊंचा करने के उपायों को गिनाते हैं, जो जमीन पर नजर नहीं आता। शासन प्रशासन की इन कोशिशों के बीच अजीब संयोग है कि जब जंगलों में सीपीआई [माओवादी] के सदस्य अपने गठन की पाचवीं बरसी का जश्न मना रहे थे, बस्तर के इंद्रावी नदी के पार ढोल मजीरे बज रहे थे, महाराष्ट्र के गढ़ चिरौली, आध्र के मल्कान गिरी और नल्लामला के जंगलों में झूमने-गाने का कार्यक्रम चल रहा था।

बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के लालगढ़ जैसे इलाकों में अगली धारदार जंग की रूपरेखा बन रही थी। ठीक उसी वक्तराष्ट्रीय राजधानी में बेस बनाने के लिए दिल्ली में सक्त्रिय उनका सबसे बड़ा नेता कोबाद गाधी पुलिस की गिरफ्त में आ गया। ठीक पाच साल पहले 21 अगस्त 2004 को तेलंगाना के बियावान जंगल में हुई विशाल सभा में सीपीआई [एमएल], पीपुल्स वार ग्रुप और एमसीसी ने आपस में विलय कर सीपीआई [माओवादी] का गठन किया गया।

इससे नक्सलियों की ताकत इस कदर बढ़ गई कि इसी साल केंद्र सरकार ने नक्सलियों को आतंकियों की श्रेणी में शामिल कर लिया और सीपीआई [माओवादी] को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल कर लिया।

पाच साल पहले अलग-अलग दल में बंटे और हिंसा के रास्ते मजबूती से विस्तार पा रहे नक्सल संगठनों ने अपना प्रभाव इलाका तय कर लिया था। आपस में वे एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी बन गए थे। 2001 से 2004 के दरम्यान शासन तंत्र इस बात से खुश रहा करता था कि इलाके में बंटे नक्सली आपस में ही मर-कट रहे हैं।

भारत के खूंखार नक्सली संगठनों के आपस में विलय को खतरनाक मंसूबे का कारगर तरीके से जमीन पर उतारने की कोशिश माना जाता है। विलय से झटके में नक्सलियों की ताकत में कई गुणा इजाफा हो गया और शासन तंत्र की तैयारी कमजोर साबित होने लगी। विलय के लिए नक्सल आदोलन से जुड़े शीर्ष बुद्धिजीवियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कोबाद गाधी विलय कराने वाले बुद्धिजीवी विचारकों में से एक है, जिसकी डोर नक्सलवाद केअंतरराष्ट्रीय नीति नियंताओं से जुड़ी है।

तो क्या कोबाद गाधी के साथ हाल के दिनों में बड़े नक्सली नेताओं की गिरफ्तारी को तेजी से पैर पसार रहे माओवाद के लिए झटका माना जाए? सरकारी जबाब है- हा। जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर नक्सलवाद के खिलाफ कारगर अभियान पर रंग चढ़ा रही सरकार तो ऐसा ही मान रही है, लेकिन यह निरा मजाक से कम नहीं।

माओवाद को खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहे केंद्रीय गृहमंत्रालय के आला अधिकारी बड़ी सफलता मानते हैं। 65 साल के कोबाद गाधी की सार्वजनिक पेशी के दौरान बार-बार कहा जा रहा है कि यह प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन सीपीआई [माओवादी] के शीर्ष 13 लोगों में से एक है। इस सोच का विस्तार करें तो बारह और शीर्ष नेताओं को पकड़ लो तो देश से माओवादी हिंसा चुटकी में खत्म हो जाएगी।

माओवादी विचारकों की नजर में इंग्लैंड के हार्वड से पढ़ा और मुंबई के अभिजात्य वर्ग की जिंदगी से मुंह मोड़कर लाल परचम लहराने वाले कोबाद गाधी की गिरफ्तारी वैसी ही है, जैसे कई नक्सली नेता जंगलों की भागदौड़ से थक कर या यों कहें कि जानबूझकर पुलिस की पकड़ में आते हैं। जेल में रहकर रिचार्ज होते हैं। आराम से अगली रणनीति का खाका तैयार करते हैं। थकावट दूर होते ही जमानती को सामने खड़ा कर देते हैं।

वैसे भी जो बातें सामने आ रही है, उनके मुताबिक कोबाद गाधी हृदय रोग से पीड़ित है। मुमकिन है कि उसने खुद गिरफ्तार होने की रणनीति बनाई हो। उसे इलाज की जरूरत है।

नक्सलवाद के खिलाफ सरकार से बड़े आपरेशंस का तमगा लेने वाले पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह बताते हैं कि कोबाद को यह सुविधा नक्सलियों की परिपक्व रणनीति का हिस्सा है। गिरफ्तारी को लेकर नक्सलवादियों ने प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है।

केंद्रीय अ‌र्द्धसैनिक बल के डीजीपी रहे इस पुलिस अधिकारी के मुताबिक, देश की न्याय व्यवस्था नक्सलियों को डराने वाली नहीं, बल्कि जेल को आरामगाह साबित करने वाली बनी हुई है।

नक्सलवाद के जमीनी हकीकतों से वाकिफ लोग मानते हैं कि नक्सली संगठन का ढाचा कोई पिरामिड सरीखा नहीं है कि ऊपर से सिर कलम कर दो नीचे का हिस्सा खुद सूख कर खत्म हो जाएगा। इसलिए ये ज्यादा खतरनाक और खूंखार हैं। कोबाद गाधी जैसी काबिलियत रखने वाले दस हजार से ज्यादा बौद्धिक वामपंथी उग्रवादी इंग्लैंड के हार्वर्ड और दिल्ली के जेएनयू से लेकर बियाबान जंगल तक में जड़ जमाए सक्रिय हैं।

नक्सली नेता इस सिलसिले में पिछले दिनों बिहार के मोतीहारी से गिरफ्तार एक नक्सली नेता की बखूबी मिसाल देते हैं। वह गिरफ्तार करने वाले सिपाही से उसके गाव का नाम पूछकर उसकी भाषा यानी लोकल जुबान में बात करने लगा। हक्के-बक्के सिपाही ने जब एसपी को उसकी खासियत बताई तो एसपी उस से मिलने चले आए। एसपी से उस नक्सली ने उसके कमीशन के बैच के सात लोगों के नाम गिना दिए, जो उसके साथ पढ़ाई कर चुके थे और एसपी के बैच के और कई अधिकारियों के नाम उसे मुंहजुबानी याद थे।

ये मिसालें इसलिए कि नक्सल हिंसा को सबसे बड़ा खतरा बताने के बावजूद उससे निपटने के लिए जो रास्ते और तरीके अपनाए जा रहे हैं, वे किसी भी तरीके से व्यवहारिक नहीं हैं। ज्यादातर पुलिस आपरेशस नक्सलियों को खत्म करने के नाम पर उनका कवच बन रहे गरीब-गुरबों की जिंदगी से खेलने वाला साबित हो रहा है। जिस तरीके से हिंसा को हिंसा से काटने का रास्ता अपनाया गया है, वह देश में माओवादी हिंसा की लहर को खत्म करने के बजाए और बढ़ाने वाला साबित हो रहा है।


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