रूस के सबसे लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह दोबारा राष्ट्रपति के रूप में देश की बागडोर संभाल सकते हैं। इस बाबत पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए 56 वर्षीय पुतिन ने कहा कि जिस तरह आपसी समझ के साथ उन्होंने 2008 के चुनावों में सत्ता की बागडोर मेदेवेदेव को सौंप दी थी। उसी तरह आगे भी समायोजन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारी राजनीतिक विचारधारा और रक्त एक है। उम्मीद है कि हम एक समझौते पर पहुंच जाएंगे। पुतिन लगातार दो बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके हैं। देश के संविधान के मुताबिक एक राष्ट्रपति लगातार दो बार से ज्यादा इस पद पर नहीं रह सकता। इस कारण पिछले साल के चुनावों में वह दिमित्री मेदेवेदेव के समर्थन में चुनाव मैदान से हट गए।
व्लादिमीर ने कहा कि हम लोग समय के अनुसार वस्तुस्थिति का विश्लेषण करेंगे और उसी हिसाब से निर्णय लिए जाएंगे। एक अन्य प्रश्न के जवाब में पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि उनके और मेदेवेदेव के बीच किसी प्रकार का सत्ता संघर्ष नहीं है। क्या हम लोग 2008 के चुनावों में लडे़ थे? इसी तरह 2012 के चुनावों में भी आपस में नहीं लड़ेंगे।
मेदेवेदेव का कार्यकाल सन 2012 में खत्म हो रहा है। रूस के नए संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार 2012 के बाद नया राष्ट्रपति छह वर्षो के दो कार्यकाल तक सत्ता में रह सकता है। अभी तक रूस में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार वर्षो का होता था। लेकिन नए नियमों के तहत पुतिन 2012 में क्रेमलिन की गद्दी संभालते हैं तो 2024 तक राष्ट्रपति बने रह सकते हैं।
जानकारों के मुताबिक अब भी रूस में वास्तविक शक्तियां पुतिन के नियंत्रण में ही हैं। हालांकि इसका खंडन करते हुए पुतिन ने कहा कि देश की वास्तविक बागडोर मेदेवेदेव के हाथ में ही है। यदि कोई इस गलतफहमी का शिकार है तो उसे नींद से जाग जाना चाहिए। इस बात में कोई संदेह नहीं कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुतिन ने रूस के नेता के रूप में सर्वाधिक ख्याति पाई है।
1990 के दशक में रूस की खराब आर्थिक हालत और विश्व समुदाय में गिरती साख को पुतिन की नीतियों ने बदल कर रख दिया। उनके शासनकाल में ही अमेरिका और रूस के रिश्तों के बीच में गर्माहट आई और रूस आर्थिक बदहाली के संकट से उबर सका। हालांकि पुतिन सत्ता में लौटते हैं तो रूस के उदारवादियों को परेशानी हो सकती है।
इनका यह आरोप है कि पुतिन के कार्यकाल के दौरान मानव अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पर कतरे गए थे