नई दिल्ली। सुप्रीमकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अगर सरकार किसी उच्चतर पद पर प्रोन्नति के लिए डिग्री और डिप्लोमा इंजीनियरों को समान मानती है तो यह असंवैधानिक नहीं है।
न्यायमूर्ति आर वी रवींद्रन और मार्कंडेय काट्जू की एक पीठ ने डिग्री धारकों के इस तर्क को खारिज कर दिया कि इस प्रकार का व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। डिग्री धारकों ने तर्क दिया था कि 'समान के साथ असमानता' का व्यवहार करने से ही अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं होता बल्कि 'असमान के साथ समानता' का व्यवहार करने से भी इसका उल्लंघन होता है।
दिलीप कुमार गर्ग और अन्य की विशेष अनुमति याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने कहा, 'यह निर्णय करने का अधिकार पूरी तरह प्रशासन पर है कि डिग्री धारकों और डिप्लोमा धारकों के साथ कनिष्ठ अभियंता से सहायक अभियंता पद पर प्रोन्नति के संबंध में समान व्यवहार किया जाए या नहीं।'
गर्ग और अन्य डिग्री धारकों ने उप्र लोक निर्माण विभाग के समूह बी सिविल इंजीनियरिंग नियम 2004 के नियम 5 [2] को चुनौती दी थी। इस नियम के तहत, राज्य सरकार ने सहायक इंजीनियर पद पर प्रोन्नति के लिए डिप्लोमा इंजीनियरों द्वारा वांछित तकनीकी योग्यता हासिल करने या पात्रता परीक्षा देने संबंधी पूर्ववर्ती प्रावधान को हटा दिया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस नियम की वैधता को बरकरार रखा था जिसके बाद डिग्री धारक इंजीनियरों ने सुप्रीमकोर्ट में अपील की थी।
गर्ग और उनके सहयोगियों ने सुप्रीमकोर्ट में तर्क दिया कि अनुच्छेद 14 का उल्लंघन न केवल 'समान के साथ असमानता' का व्यवहार करने से ही नहीं होता बल्कि 'असमान के साथ समानता' का व्यवहार करने से भी होता है। उनका तर्क था कि डिग्री धारक होने के नाते वे सहायक इंजीनियर पद के लिए डिप्लोमा धारकों की तुलना में अधिक योग्य हैं। इसके अलावा, डिग्री और डिप्लोमा धारकों के साथ समान व्यवहार किए जाने से अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है।