नई दिल्ली। लौटे हैं दिल्ली से टिकट मार के, सिंडकेटी प्रभुओं की पग धूरि झार के, खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के, आए दिन बहार के।
बाबा नागार्जुन की दशकों पहले लिखी कविता की यह पंक्ति पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव से पूर्व विभिन्न राजनीतिक दलों के यहां स्थित मुख्यालयों में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच टिकट पाने के लिए मची मारामारी की जीवंत तस्वीर पेश करती है।
कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड और भारतीय जनता पार्टी के 11 अशोक रोड स्थित मुख्यालय पर इन दिनों टिकट पाने के लिए छोटे-बड़े नेताओं का मेला लगा है। इस भीड़ में भाषाई अनेकता, वेशभूषा की विविधता तथा प्रजातीय विभिन्नता लघु भारत की अनोखी झलक प्रस्तुत कर रहे हैं। एक ही नजर में यहां कश्मीर से कन्याकुमारी तथा नगालैंड से कच्छ तक की जीवंत तस्वीर देखी जा सकती है।
चुनावी दंगल में कूदने के लिए तैयार यहां मौजूद रथी और महारथी अपने साथ अनुशासित समर्थकों की फौज लेकर भी आए हैं, जो टिकट बांटने वालों का ध्यान आकर्षित करने के लिए उचित समय पर नारेबाजी करते हैं और अपने नेता तक हर दरबार में हो रही हलचल की सूचना भी पहुंचाते हैं। टिकट झपटने की प्रक्रिया में सभी रथी और महारथी हर दांव खेलने के लिए तैयार हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तरों के सामने बहुत भीड़ नहीं है लेकिन पश्चिम बंगाल तथा केरल से आने वाले लोगों की तादाद कुछ ज्यादा है। भीड़ कम रहने की वजह से वाम दलों के कार्यालयों के सामने स्थिति सामान्य है।
क्षेत्रीय दलों के कार्यालयों के सामने भी बहुत भीड़ नहीं है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और यहां तक कि राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति जैसी पार्टियों के कार्यालयों के सामने स्थिति सामान्य है। इनमें ज्यादातर पार्टियों के मुख्यालय राज्यों की राजधानियों में हैं, इसलिए इन दलों के कार्यकर्ताओं के लिए दिल्ली बहुत महत्व नहीं रखती है लेकिन इन पार्टियों के प्रभावशाली नेताओं के आवासों पर जमघट लगा है।
राकांपा नेता शरद पवार, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और लोजपा के रामविलास पासवान के घर के सामने भीड़ लगी रहती है। इन दलों में चूंकि इन्हीं नेताओं की निर्णायक स्थिति है इसलिए स्वाभाविक है कि भीड़ उन्हीं के घर पर है।
जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दलों के कार्यालय संबद्ध राज्यों की राज्यों की राजधानियों में ही हैं, इसलिए इन दलों के सांसदों के बंगलों पर उनके कुछ खास लोगों का ही आना-जाना है। इसे टिकट अभिलाषियों की भीड़ नहीं कहा जा सकता है। यहां तक कि इंडियन नेशनल लोकदल और अकाली दल के मुख्यालय भी दिल्ली में नहीं हैं इसलिए इन दलों के कार्यकर्ता अपनी पार्टी के सांसदों के आवासों तक ही सीमित हैं।
कांग्रेस मुख्यालय और भाजपा मुख्यालय देशभर के पार्टी कार्यकर्ताओं का मक्का है। इन कार्यालयों में उमड़ी भीड़ को देखकर लगता है कि इन दलों से टिकट पाने के इच्छुक हर कार्यकर्ता को तब तक मंजिल नहीं मिलती है, जब तक वह मुख्यालय नहीं पहुंच जाता है। सुबह से देर रात तक यहां जन सैलाब उमड़ा रहता है। भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी-अपनी पार्टियों के झंडे के रंग का दुपट्टा अपने गले में टहलते दिखाई देते हैं।
पार्टी मुख्यालयों के बाहर कारों की लंबी कतारों, मीडिया की गाड़ियों तथा आटो और टैक्सियों की आवाजाही के बीच जब पार्टी का कोई बड़ा नेता आता है तो उसे अपनी एक झलक दिखाने के लिए लोगों में होड़ मच जाती है। भीड़ की सक्रियता एकदम बढ़ जाती है और देखते ही देखते पार्टी महासचिव या चुनाव कार्य से जुड़ा पार्टी का नेता भीड़ से घिर जाता है। बायोडाटा लिए असंख्य हाथ उसकी तरफ बढ़ते हैं और वह भी कागजों को एकत्र करते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करता है। कुछ लोग भीड़ कम होने का इंतजार करते हुए अपना बायोडाटा थमाते हैं और स्वयं को निर्विवाद जीत का प्रबल दावेदार और क्षेत्र का लोकप्रिय नेता बताते हुए टिकट की मांग करते हैं।
कुछ जातीय, क्षेत्रीय और भौगोलिक समीकरणों को अपने अनुकूल बताते हैं और टिकट मांगते हैं। पार्टी का सयाना महासचिव भी इस अंदाज से जवाब देता है मानो उस व्यक्ति को वह लंबे समय से जानता है इसलिए उसका टिकट अब पक्का हो गया है।
भाजपा और कांग्रेस मुख्यालयों में कार्यालय के भीतर के बजाय बाहर सड़क पर ज्यादा मजेदार माहौल नजर आता है। वहां फुटपाथ पर चादर बिछाए बैठे लोग पार्टी के झंडे, बिल्ले आदि बेच रहे हैं। वहां भीड़ कम जरूर है लेकिन हर व्यक्ति वहां नजर टिकाए बिना आगे नहीं बढ़ रहा है।
फुटपाथ पर कुछ लोग गुटखा और बीडी- सगरेट बेच रहे हैं। वहां जरूर अच्छी भीड़ है। हर व्यक्ति वहां से आगे बढ़ते हुए धुआं उड़ाता हुआ नजर आ रहा है। उनके पास बेचने के लिए हर ब्रांड की सिगरेट और बाजार में उपलब्ध हर कंपनी का गुटखा मिल रहा है।
कांग्रेस के एक बड़े पदाधिकारी का कहना है कि इस भीड़ का कोई मतलब नहीं है। जो सचमुच टिकटमार हैं वे प्रभावशाली नेताओं के जरिए टिकट झपट रहे हैं। उनका अपना गुट है और हर गुट के मुखिया के आदमी को टिकट दिलाने का काम मुखिया का होता है। उनका कहना है कि भाजपा हो या कांग्रेस लामबंदी से लोगों को टिकट दिए जाते हैं। मुख्यालयों पर नारे लगाने वाले और बायोडाटा थामकर चलने वाले तो जैसे आए थे वैसे ही लौट जाते हैं।