अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों ने बीते छह दशक में भले ही काफी प्रगति कर ली हो, लेकिन लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में उन्हें दिए गए आरक्षण का मकसद अभी पूरा नहीं माना जा रहा है। लिहाजा आरक्षण को अगले दस साल तक बढ़ाने के लिए लाए गए संविधान [एक सौ नौवां संशोधन] विधेयक को सोमवार को राज्यसभा ने मंजूरी दे दी। विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आंग्ल भारतीय [एंग्लो इंडियन] समुदाय के मनोनीत होने वाले प्रतिनिधियों के लिए भी आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली की ओर से राज्यसभा में पेश संविधान [एक सौ नौवां संशोधन] विधेयक-2009 के मुताबिक लोकसभा व विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों , जनजातियों [एसटी] और आंग्ल-भारतीय प्रतिनिधियों को संविधान के अनुच्छेद-334 के तहत दिए गए आरक्षण की समय सीमा 25 जनवरी, 2010 को खत्म हो रही है। उसे अगले दस वर्षों के लिए बढ़ाने के बाबत संविधान में 109वां संशोधन करने की जरूरत है। इसलिए उक्त अनुच्छेद में 60 वर्षों के स्थान पर अब 70 वर्ष दर्ज करने के लिए सरकार को संविधान संशोधन का यह विधेयक लाना पड़ा। सरकार का तर्क है कि बीते साठ वर्षों में एससी-एसटी का वैसे तो काफी विकास हुआ है, लेकिन संविधान सभा ने जिस मकसद से यह आरक्षण दिया था, वह अभी मुकाम तक नहीं पहुंचा है। इसलिए यह व्यवस्था अगले दस वर्षों के लिए बढ़ाया जाना जरूरी है।
विधेयक के अहम होने के कारण विपक्षी ही नहीं, सत्ता पक्ष ने भी अपने सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने के लिए ह्विप जारी किया था। लिहाजा विधेयक पेश होने और खंडवार उसके पारित होने तक में मत विभाजन की प्रक्रिया अख्तियार की गई। अंतत: बहुमत के आधार पर सदन ने इस विधेयक को मंजूरी दे दी।