नई दिल्ली। मौसम का मिजाज भांपते हुए सरकार ने 9 लाख टन तक गेहूं के निर्यात की अनुमति सोमवार को वापस ले ली। इसके साथ ही गेहूं के निर्यात पर पाबंदी फिर से लागू हो गई है। सरकार ने महज 10 दिन पहले ही गेहूं के निर्यात को मंजूरी दी थी।
पूर्व में दी गई अनुमति रद्द करने के लिए विदेश व्यापार महानिदेशालय [डीजीएफटी] ने एक अधिसूचना जारी की है। इसके जरिए डीजीएफटी ने 3 जुलाई को जारी अधिसूचना रद्द कर दी है। इसमें सीमित मात्रा में गेहूं निर्यात को मंजूरी दी गई थी। पहले की अधिसूचना में एमएमटीसी, पीईसी और एसटीसी को 3-3 लाख टन गेहूं का 31 मार्च 2010 तक निर्यात करने की इजाजत दी गई थी। हालांकि सरकार ने इसी अवधि में गेहूं से बने 6.5 लाख टन तक के उत्पादों के निर्यात की मंजूरी बरकरार रखी है।
महंगाई पर काबू पाने के लिए गेहूं व इसके उत्पादों के निर्यात पर वर्ष 2007 में प्रतिबंध लगाया गया था। देश में मानसून में विलंब के चलते खरीफ उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। माना जा रहा है कि इसी आशंका के मद्देनजर सरकार ने निर्यात की अनुमति वापस लेने संबंधी कदम उठाया है।
वर्ष 2008-09 में देश का गेहूं उत्पादन 7.763 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पूर्व वर्ष के 7.857 करोड़ टन के मुकाबले कम है। खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के लिए सरकार को अधिक मात्रा में खाद्यान्न की जरूरत होगी। इसके तहत सरकार गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारों को प्रति माह 3 रुपये प्रति किलो की दर से 25 किलो गेहूं या चावल उपलब्ध कराने संबंधी कानून बनाने वाली है। खाद्य सुरक्षा को लेकर सोमवार सुबह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बैठक में फसल की स्थिति एवं मानसून की प्रगति की समीक्षा की। इसमें प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को आपात योजना तैयार रखने को कहा है। बैठक में मौजूद रहे कृषि मंत्री शरद पवार ने बताया कि भारतीय मौसम विभाग ने जो अनुमान जताया है उससे मैं कह सकता हूं कि संपूर्ण सप्ताह अच्छा होगा। अगर अनुमान सही हुआ तो हम संकट से बाहर होंगे।