इस दफा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पंजाब में काफी बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद है। पर उत्साहित कांग्रेस की राह में बसपा रोड़े अटका सकती है। बसपा इस दफा भी वहां सभी 13 सीटों से लड़ सकती है। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा। परिसीमन के बाद राज्य की कुछ लोकसभा सीटों का स्वरूप बदल गया है। आरक्षित सीटों की संख्या भी तीन से चार हो गई है। ऐसे में बसपा की सक्रियता कांग्रेस के माथे पर चिंता की कुछ लकीरें जरूर डाल रही है।
पिछली दफा कांग्रेस पंजाब की 13 में से केवल दो सीटें - पटियाला और जालंधर - ही जीत पाई थी। इसकी एक वजह बसपा का 13 सीटों से लड़ना भी था। 1999 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने केवल तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार दिए थे। तब उसे 3.84 फीसदी वोट मिले थे। 2004 में बसपा सभी सीटों पर लड़ी और 7.67 फीसदी वोट ले गई। बस यहीं कांग्रेस का गणित गड़बड़ाया और शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन आसानी से 13 में से 11 सीटें फतह कर गया। यहां यह भी बताते चलें कि 2004 के चुनाव में कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल का मत प्रतिशत लगभग बराबर - 34 फीसदी - रहा था। लेकिन भाजपा के 10.48 फीसदी वोट ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया।
पंजाब में बसपा, माकपा व भाकपा भले बड़ी राजनीतिक ताकतें न रह गई हों पर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। असल में इनका वोट बैंक पिछड़ा व अनुसूचित जाति वर्ग है। पंजाब में इस वर्ग के 25 फीसदी मतदाता हैं। यह वर्ग लंबे समय से कांग्रेस के ही साथ रहा है, पर बसपा के मैदान में आ जाने से इसमें सेंध लग रही है। खास कर जब आरक्षित सीटें बढ़ गई हैं तो कांग्रेस को इसकी चिंता ज्यादा सता रही है।
कांग्रेस के बसपा से मेल की तो कोई संभावना नहीं है पर बसपा, माकपा और भाकपा के बीच कुछ समझ बन सकती है। भाकपा का पिछली दफा एक उम्मीदवार लड़ा था। हारने के बावजूद उसे ढाई लाख से अधिक मत मिले थे। इसी तरह माकपा के एक उम्मीदवार को भी लगभग पौने दो लाख मत मिले थे। अगर बसपा, माकपा व भाकपा हाथ मिला लें तो एक-दो सीटे निकाल ले जाना असंभव नहीं होगा। 1999 में भाकपा का एक उम्मीदवार पंजाब से जीता भी था।
1999 में जब कांग्रेस ने 13 में से 8 सीटें जीती थीं, तब उसे 38.44 फीसदी मत मिले थे। 2004 में कांग्रेस का मत प्रतिशत केवल चार फीसदी कम हुआ, लेकिन उसकी सीटें घट कर दो रह गई। इस दौरान बसपा का मत प्रतिशत चार फीसदी बढ़ गया था। इससे उत्साहित बसपा अब पंजाब पर ध्यान दे रही है। होशियारपुर के अवतार सिंह करीमपुरी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में लाना भी इसी नीति का हिस्सा है।