नई दिल्ली। पिछले चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के करिश्माई व्यक्तित्व और 23 दलों वाले लगभग एकजुट राजग के बावजूद भाजपा के नेतृत्व वाला मोर्चा चुनाव हार गया था। लेकिन इस बार न तो वैसा व्यक्तित्व शीर्ष पर है और राजग के घटक दलों की संख्या भी सिमटकर फिलहाल छह रह गई है। इसके बावजूद सत्ता के सपने संजोने में राजग पीछे नहीं है।
राजग के महत्वपूर्ण घटक दल बीजू जनता दल ने शनिवार को भाजपा की अगुवाई से दामन छुड़ाने की घोषणा करके उसे एक करारा झटका दिया है और साथ ही लालकृष्ण आडवाणी के 'पीएम इन वेटिंग' के सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है।
कुनबे में बिखराव की शुरुआत के बावजूद राजग की जीत के सपने पर भाजपा के एक बड़े नेता का कहना था कि 'चुनाव में विपक्ष नहीं जीतता बल्कि सरकार हारती है।' पार्टी प्रवक्ता रवि शंकर प्रसाद का दावा है कि संप्रग के आम आदमी के मुखौटे की पोल खुल चुकी है और जनता कांग्रेस को झूठे वायदे करने का सबक सिखाने के लिए बेताब है।
वर्ष 2004 तक भाजपा का ग्राफ काफी ऊंचा था और उसके फिर से चुनाव जीतने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन लगभग सभी अटकलों के बरखिलाफ इंडिया शाइनिंग का नारा उल्टा पड़ गया और 'सरकार हार गई' तथा विपक्ष [कांग्रेस नीत संप्रग] जीत गया। अब भाजपा को इसी कहावत के सच होने की उम्मीद है कि 'सरकार हारेगी और विपक्ष जीतेगा।'
पिछले लोस चुनाव में बड़ा झटका खाने के कुछ ही समय बाद भाजपा का ग्राफ फिर चढ़ने लगा था। लोस चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस को जहां 14 विस चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा, वहीं भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ बिहार, उड़ीसा, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक आदि में लगातार जीत हासिल करती रही। लेकिन आगामी लोस चुनाव से ऐन पहले दिल्ली और राजस्थान सहित छह में से चार विस चुनाव हार जाने से उसके विजयी अभियान पर झटकेदार ब्रेक लगा।
छह दलों में सिमटे राजग के घटक दल भाजपा पर अपनी शर्ते थोपने का लगातार दबाव बनाए हुए हैं जिनमें शिवसेना, जद-यू, अकाली दल, इंडियन नेशनल लोकदल और राष्ट्रीय लोकदल शामिल हैं। भाजपा ने कुछ दिन पहले असम गण परिषद [अगप] के राजग में शामिल होने की घोषणा की, लेकिन उसने कुछ ही देर बाद इसका खंडन करते हुए कहा कि वह राजग का हिस्सा नहीं है केवल सीटों के बंटवारे को राजी हुआ है।
भाजपा को इस बार पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और केरल में कोई सहयोगी दल नहीं मिलना बड़ी परेशानी का सबब है, क्योंकि लोकसभा की 543 सीटों की एक तिहाई यानी 171 सीट इन्हीं राज्यों से हैं। पिछले आम चुनाव में भाजपा कांग्रेस से पिछड़कर 138 सीट पर सिमट गई और उसके नेतृत्व वाले राजग को कुल 181 सीटें मिलीं। उधर कांग्रेस ने अपने बूते 145 सीटें जीतने के साथ अपने सहयोगी दलों के साथ 221 का आंकड़ा छुआ और वाम दलों के समर्थन से सरकार बनाई।
राजनीतिक शास्त्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर जोया हसन ने कहा, 'आगामी लोकसभा चुनाव की दौड़ में भाजपा और कांग्रेेस दोनों ही अपने बूते वहां तक पंहुचने का ख्वाब तक नहीं देख सकते।' राजनीतिक विशलेषक वेंकटेश कुमार ने कहा, 'यह सच है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही स्थिति अच्छी नहीं है। लेकिन उससे बड़ी सचाई यह है कि आगामी सरकार भाजपा या कांग्रेस के बिना बन भी नहीं सकती। इन दोनों दलों में से किसी एक का साथ लिए बिना तीसरा मोर्चा जैसी कोई चीज 272 सीटों का जादुई आंकड़ा नहीं जुटा सकती।'
उन्होंने कहा कि इस स्थिति में भाजपा अपनी तमाम कमियों के बावजूद भी सरकार बनाने की दौड़ में शामिल रहेगी। बात इस पर निर्भर करेगी कि चुनाव बाद इन दोनों सबसे बड़े राष्ट्रीय दलों में से कौन अधिक से अधिक क्षेत्रीय दलों को लुभा पाता है। इन्हीं संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने बृहस्पतिवार को यह तक ऐलान कर डाला कि वह राम मंदिर, अनच्च्छेद 370 और समान नागरिक संहिता जैसे अपने प्रिय किंतु विवादास्पद मुद्दों को गठबंधन पर नहीं लादेंगे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, 'गठबंधन पर विचारधारात्मक पूर्वाग्रहों को हावी नहीं होने देना चाहिए।'