अफ़ग़ानिस्तान के सांसदों ने एक प्रस्ताव पारित करके अपने लिए एक रक्षा कवच तैयार कर लिया है.
इस प्रस्ताव में कहा गया है कि अब उन सांसदों पर कोई मुक़दमा नहीं चलाया जा सकेगा जिन पर मानवाधिकार हनन के आरोप हैं.
उल्लेखनीय है कि संसद के कई सदस्यों पर पिछले तीस सालों में, जब अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत कब्ज़ा था या गृहयुद्ध चल रहा था, मानवाधिकार हनन के आरोप हैं.
ये सदस्य उस समय क़बीलाई सरदारों या लड़ाकों के रुप में सक्रिय थे.
दरअसल सांसद मानवाधिकार पर नज़र रखने वाली संस्था ह्यूमनराइट्स वॉच की रिपोर्ट पर चर्चा कर रहे थे. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जो भी संसद सदस्य पूर्व में मानवाधिकार हनन के दोषी रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ अब कार्रवाई होनी चाहिए.
ये किसी से छिपा नहीं है कि नब्बे के दशक में लोगों पर अत्याचार के ज़िम्मेदार हराए गए कई लोग इस समय संसद के सदस्य हो गए हैं.
इनमें से कई लोगों पर युद्धापराध का मामला भी दर्ज़ है.
यही वह समय था जब मुजाहिदीनों के गुटों ने दसियों हज़ार नागरिकों की हत्या कर दी थी और इनके आपसी झगड़ों और गोलीबारी में ज़्यादातर काबुल तबाह हो गया था.
प्रस्ताव
पहले तो संसद में इस रिपोर्ट पर चर्चा हुई. फिर एक प्रस्ताव पारित किया गया कि जो लोग पुरानी लड़ाइयों में शामिल थे, अब उनको अब सज़ा न दी जाए.

चार साल पहले तालेबान सरकार के पतन के बाद कई ऐसे लोग, जो पहले क़बीलाई सरदार के रुप में हथियार थामे हुए थे अब सत्ता के गलियारों में ताक़तवर हो गए हैं.
बीबीसी के काबुल संवाददाता एलिस्टेयर लीटहेड का कहना है कि इस प्रस्ताव से एक ऐसा सच कागज़ पर आ गया है जिसके बारे में अफ़ग़ान पहले से ही जानते थे.
हालांकि अभी यह प्रस्ताव क़ानून नहीं बना है. इसके लिए इसे कुछ और औपचारिकताएँ पूरी करनी होंगी और फिर इस पर राष्ट्रपति के दस्तख़त होंगे.
लेकिन जो लोग पुराने क़बीलाई लड़ाकों और मुजाहिदीनों के विरोधी हैं, उनका कहना है कि ये लोग अपने आपको सज़ा और जवाबदेही से बचाने के लिए राजनीतिक रास्ते का उपयोग कर रहे हैं.