नई दिल्ली, ऑस्कर में धूम मचा चुकी फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' में हॉट सीट पर बैठे जमाल ने अपने जीवन में होने वाली घटनाओं के आधार पर सामान्य ज्ञान के प्रश्नों के सही उत्तर देकर अपनी किस्मत बदल डाली तो निरंकारी कॉलोनी के सपेरा बस्ती की झुग्गियों में रहने वाले सात साल के अभय जैसे कई बच्चे भी अपनी किस्मत बदलना चाहते हैं।
पर यह जरूरी नहीं है कि जमाल जैसा संयोग इन बच्चों के साथ घटित हो, इसलिए ऐसा ज्ञान वे वास्तव में प्राप्त कर करना चाहते हैं। तभी तो 'कूड़ा' बीनने वाले ये बच्चे इन दिनों किताबों से 'अक्षरों' को बीनने में लगे हैं। यहां के बच्चों ने आज तक स्कूल का मुंह नहीं देखा है, लेकिन अब वे पढ़ना चाहते हैं। इन बच्चों की आंखों में कंप्यूटर सीखने, डॉक्टर-जज आदि बनने के सपने हिलोरे मारने लगे हैं। सच कहें तो वे रुपहले पर्दे के सपने 'स्लमडॉग मिलियनेयर' को हकीकत की जमीन पर उतारना चाहते हैं और उनके सपनों में जान फूंकने में नेशनल कंफेडरेशन आफ दलित आर्गेनाइजेशन [नैक्डोर] जैसे संगठन जी जान से लगा है।
निरंकारी कॉलोनी के सपेरा बस्ती में जोगीनाथ बंजारा समाज के करीब सौ परिवार रहते हैं। पहले जंगलों में सांप पकड़ने का पारंपरिक काम करने वाले इस समाज के बच्चों ने कभी स्कूल जाने की जरूरत महसूस नहीं की। पर कूड़ों के ढेरों पर अपनी जिंदगी तलाशने वाले यहां के बच्चों ने अब कलम-कॉपियों से नाता जोड़ लिया है। इसके लिए वे खुले आसमान के नीचे पढ़ना-लिखना सीख रहे हैं और उन्हें पढ़ना-लिखना सिखा रही हैं नैक्डोर की निर्मल। सात वर्षीय अभय कहता है कि वह भी हॉट सीट पर बैठना चाहता है और इसके लिए वह पढ़कर कंप्यूटर सीखना चाहता है, जबकि आठ साल की शबाना की हसरत पढ़ लिखकर डॉक्टर बनने की है। इस बारे में नैक्डोर के चेयरमेन अशोक भारती कहते हैं कि सपेरा बस्ती के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देकर इस योग्य बनाया जा रहा है कि वे स्कूलों के अच्छे वातावरण में आगे पढ़ सकें। इसके लिए उन्हें हर तरह की सहायता दी जा रही है। बच्चों में पढ़ने के प्रति लालसा पैदा हुई है। बस्ती में रहने वाले 24 वर्षीय चरत कहते हैं कि उनके बच्चे अब कॉपी किताब मांगने लगे हैं और वे स्कूल भी जाना चाहते हैं। वास्तव में सपेरा बस्ती के बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिए यह एक अच्छा संकेत है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि इन बच्चों की जय हो..। उनके सपनों की जय हो ...।